बिहार: ज्ञान की धरती से पलायन की धरती तक — आखिर जिम्मेदार कौन?
"यदि किसी राज्य का भविष्य देखना हो, तो उसके स्कूलों में जाकर देखिए। वहाँ बैठे बच्चे ही उस राज्य का आने वाला कल हैं।"
बिहार का नाम आते ही सबसे पहले याद आता है—नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट, चाणक्य और डॉ. राजेंद्र प्रसाद। यह वह भूमि है जिसने दुनिया को ज्ञान दिया। लेकिन आज विडंबना यह है कि उसी बिहार के लाखों छात्र बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
क्या यही विकसित बिहार का सपना था?
आज भी बिहार के अनेक सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट में दरभंगा व मुजफ्फरपुर के एक विद्यालय की स्थिति ने पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
12वीं के 240 विज्ञान छात्रों पर मात्र 1 विज्ञान शिक्षक।9वीं और 10वीं के 440 छात्रों पर भी केवल 1 विज्ञान शिक्षक।
यह केवल एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ लाखों बच्चों का भविष्य सीमित संसाधनों और अपर्याप्त शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया गया है।
सरकारें बदलती रहीं, लेकिन शिक्षा क्यों नहीं बदली?
हर चुनाव में विकास, रोजगार और शिक्षा के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। नए स्कूलों की घोषणाएँ होती हैं, भवन बनते हैं, योजनाएँ शुरू होती हैं। लेकिन सवाल यह है—
क्या केवल भवन बना देने से शिक्षा आ जाती है?
यदि कक्षा में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो स्मार्ट क्लास, रंगीन दीवारें और योजनाएँ बच्चों का भविष्य नहीं बदल सकतीं।
बिहार का सबसे बड़ा निर्यात क्या है?
कभी कहा जाता था कि बिहार ज्ञान का निर्यात करता है।
आज लोग कहते हैं कि बिहार मजदूरों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है।
हर साल लाखों युवा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना की ओर जाते हैं। कोई फैक्ट्री में काम करता है। कोई निर्माण स्थल पर। कोई होटल में। कोई सुरक्षा गार्ड बनता है। कोई डिलीवरी बॉय। मेहनत करना अपमान नहीं है।लेकिन यदि लाखों युवाओं को अपने ही राज्य में अवसर न मिले और मजबूरी में घर छोड़ना पड़े, तो यह एक गंभीर नीति-स्तरीय चुनौती है।
आखिर ऐसा क्यों होता है?
क्योंकि शिक्षा कमजोर है।
शिक्षा कमजोर होगी तो कौशल कमजोर होगा।
कौशल कमजोर होगा तो उद्योग नहीं आएंगे।
उद्योग नहीं आएंगे तो रोजगार नहीं मिलेगा।
रोजगार नहीं मिलेगा तो पलायन होगा।
और पलायन होगा तो बिहार की अर्थव्यवस्था दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी।
सबसे अधिक नुकसान किसका?
सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब परिवार का होता है जो अपने बेटे या बेटी को पढ़ाने के लिए खेत बेच देता है।
जब सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं मिलते, तो वही परिवार महंगी कोचिंग का खर्च उठाने में असमर्थ रहता है।
परिणाम—
गरीब और गरीब होता जाता है।
अमीर आगे निकल जाता है।
यही शिक्षा में असमानता की शुरुआत है।
यदि यही स्थिति रही तो आने वाले 20 वर्षों में क्या होगा?
प्रतिभाशाली युवा राज्य छोड़ते रहेंगे।
उद्योग निवेश करने से बचेंगे।
बेरोजगारी बढ़ेगी।
प्रति व्यक्ति आय कम रहेगी।
सरकारी नौकरियों पर निर्भरता और बढ़ेगी।
सामाजिक असंतोष बढ़ेगा।
समाधान क्या है?
सिर्फ आलोचना से बदलाव नहीं आता।
जरूरत है—
सभी रिक्त शिक्षक पदों पर पारदर्शी भर्ती।
विज्ञान, गणित और अंग्रेज़ी विषयों में विशेष भर्ती अभियान।
सरकारी स्कूलों में आधुनिक प्रयोगशालाएँ।
प्रत्येक प्रखंड में स्किल डेवलपमेंट सेंटर।
स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन।
स्टार्टअप और MSME के लिए सरल नीति।
शिक्षा बजट में वृद्धि और उसके प्रभावी उपयोग की निगरानी।
विद्यालयों में नियमित शैक्षणिक ऑडिट।
जनता की भी जिम्मेदारी
सिर्फ सरकार को दोष देकर समस्या समाप्त नहीं होगी।
जब तक शिक्षा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा नहीं बनेगी, तब तक प्राथमिकताएँ नहीं बदलेंगी।
जाति, धर्म और भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर यदि जनता शिक्षा और रोजगार पर वोट मांगना शुरू करेगी, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।
निष्कर्ष
बिहार के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।
कमी है तो केवल अवसरों की।
बिहार को मजदूर देने वाला राज्य नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, उद्यमी और उद्योगपति देने वाला राज्य बनना चाहिए।
क्योंकि—
"जिस राज्य के स्कूल कमजोर होते हैं, उसका भविष्य भी कमजोर हो जाता है।"
और अंत में सरकार, विपक्ष और समाज—तीनों से एक सवाल:
क्या हम आने वाली पीढ़ी को भी पलायन, बेरोजगारी और अधूरी शिक्षा की विरासत देना चाहते हैं, या ऐसा बिहार बनाना चाहते हैं जहाँ युवाओं को सम्मानजनक शिक्षा और रोजगार अपने ही राज्य में मिले?
