Monday, 3 August 2026

बिहार: ज्ञान की धरती से पलायन की धरती तक

 बिहार: ज्ञान की धरती से पलायन की धरती तक — आखिर जिम्मेदार कौन?

"यदि किसी राज्य का भविष्य देखना हो, तो उसके स्कूलों में जाकर देखिए। वहाँ बैठे बच्चे ही उस राज्य का आने वाला कल हैं।"

बिहार का नाम आते ही सबसे पहले याद आता है—नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट, चाणक्य और डॉ. राजेंद्र प्रसाद। यह वह भूमि है जिसने दुनिया को ज्ञान दिया। लेकिन आज विडंबना यह है कि उसी बिहार के लाखों छात्र बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।

क्या यही विकसित बिहार का सपना था?

आज भी बिहार के अनेक सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट में दरभंगा व मुजफ्फरपुर के एक विद्यालय की स्थिति ने पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

12वीं के 240 विज्ञान छात्रों पर मात्र 1 विज्ञान शिक्षक।9वीं और 10वीं के 440 छात्रों पर भी केवल 1 विज्ञान शिक्षक।

यह केवल एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ लाखों बच्चों का भविष्य सीमित संसाधनों और अपर्याप्त शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया गया है।

सरकारें बदलती रहीं, लेकिन शिक्षा क्यों नहीं बदली?

हर चुनाव में विकास, रोजगार और शिक्षा के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। नए स्कूलों की घोषणाएँ होती हैं, भवन बनते हैं, योजनाएँ शुरू होती हैं। लेकिन सवाल यह है—

क्या केवल भवन बना देने से शिक्षा आ जाती है?

यदि कक्षा में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो स्मार्ट क्लास, रंगीन दीवारें और योजनाएँ बच्चों का भविष्य नहीं बदल सकतीं।

बिहार का सबसे बड़ा निर्यात क्या है?

कभी कहा जाता था कि बिहार ज्ञान का निर्यात करता है।

आज लोग कहते हैं कि बिहार मजदूरों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है।

हर साल लाखों युवा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना की ओर जाते हैं। कोई फैक्ट्री में काम करता है। कोई निर्माण स्थल पर। कोई होटल में। कोई सुरक्षा गार्ड बनता है। कोई डिलीवरी बॉय। मेहनत करना अपमान नहीं है।लेकिन यदि लाखों युवाओं को अपने ही राज्य में अवसर न मिले और मजबूरी में घर छोड़ना पड़े, तो यह एक गंभीर नीति-स्तरीय चुनौती है।

आखिर ऐसा क्यों होता है?

क्योंकि शिक्षा कमजोर है।

शिक्षा कमजोर होगी तो कौशल कमजोर होगा।

कौशल कमजोर होगा तो उद्योग नहीं आएंगे।

उद्योग नहीं आएंगे तो रोजगार नहीं मिलेगा।

रोजगार नहीं मिलेगा तो पलायन होगा।

और पलायन होगा तो बिहार की अर्थव्यवस्था दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी।

सबसे अधिक नुकसान किसका?

सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब परिवार का होता है जो अपने बेटे या बेटी को पढ़ाने के लिए खेत बेच देता है।

जब सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं मिलते, तो वही परिवार महंगी कोचिंग का खर्च उठाने में असमर्थ रहता है।

परिणाम—

गरीब और गरीब होता जाता है।

अमीर आगे निकल जाता है।

यही शिक्षा में असमानता की शुरुआत है।

यदि यही स्थिति रही तो आने वाले 20 वर्षों में क्या होगा?

प्रतिभाशाली युवा राज्य छोड़ते रहेंगे।

उद्योग निवेश करने से बचेंगे।

बेरोजगारी बढ़ेगी।

प्रति व्यक्ति आय कम रहेगी।

सरकारी नौकरियों पर निर्भरता और बढ़ेगी।

सामाजिक असंतोष बढ़ेगा।

समाधान क्या है?

सिर्फ आलोचना से बदलाव नहीं आता।

जरूरत है—

सभी रिक्त शिक्षक पदों पर पारदर्शी भर्ती।

विज्ञान, गणित और अंग्रेज़ी विषयों में विशेष भर्ती अभियान।

सरकारी स्कूलों में आधुनिक प्रयोगशालाएँ।

प्रत्येक प्रखंड में स्किल डेवलपमेंट सेंटर।

स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन।

स्टार्टअप और MSME के लिए सरल नीति।

शिक्षा बजट में वृद्धि और उसके प्रभावी उपयोग की निगरानी।

विद्यालयों में नियमित शैक्षणिक ऑडिट।

जनता की भी जिम्मेदारी

सिर्फ सरकार को दोष देकर समस्या समाप्त नहीं होगी।

जब तक शिक्षा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा नहीं बनेगी, तब तक प्राथमिकताएँ नहीं बदलेंगी।

जाति, धर्म और भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर यदि जनता शिक्षा और रोजगार पर वोट मांगना शुरू करेगी, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।

निष्कर्ष

बिहार के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।

कमी है तो केवल अवसरों की।

बिहार को मजदूर देने वाला राज्य नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, उद्यमी और उद्योगपति देने वाला राज्य बनना चाहिए।

क्योंकि—

"जिस राज्य के स्कूल कमजोर होते हैं, उसका भविष्य भी कमजोर हो जाता है।"

और अंत में सरकार, विपक्ष और समाज—तीनों से एक सवाल:

क्या हम आने वाली पीढ़ी को भी पलायन, बेरोजगारी और अधूरी शिक्षा की विरासत देना चाहते हैं, या ऐसा बिहार बनाना चाहते हैं जहाँ युवाओं को सम्मानजनक शिक्षा और रोजगार अपने ही राज्य में मिले?

Saturday, 25 January 2025

पुराने साथियों और संस्थापक सदस्यों का सम्मान और संगठन की एकता: एक महत्वपूर्ण पहल


आम आदमी पार्टी (AAP) आज देश की सबसे तेज़ी से उभरती हुई राजनीतिक पार्टियों में से एक है। लेकिन इसका सफर केवल विचारधारा और नेतृत्व तक सीमित नहीं है। यह उन हजारों लोगों की मेहनत और बलिदान का नतीजा है, जिन्होंने एक बेहतर समाज और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था के लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। आंदोलन से राजनीतिक संगठन तक की यात्रा आसान नहीं थी। यह संभव हो पाया केवल उन कार्यकर्ताओं, नेताओं और आंदोलनकारियों के समर्पण से, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर संगठन के उद्देश्यों को रखा।

संगठन की नींव और संघर्ष का दौर

आम आदमी पार्टी का उदय सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक आंदोलन की परिणति थी। यह पार्टी उन लोगों की उम्मीदों और सपनों पर आधारित है, जो एक सशक्त और पारदर्शी लोकतंत्र की चाहत रखते थे। जमीनी स्तर पर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने अपने जीवन की सबसे अनमोल चीजें—नौकरी,समय, पैसा और मेहनत—इस संगठन के लिए झोंक दीं।

दिल्ली से लेकर पंजाब और क्षेत्रीय पार्टी से राष्ट्रीय पार्टी बनने तक का सफर उनकी  तपस्या का परिणाम है। पार्टी के हर छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता ने इस सफलता की कहानी में अपना योगदान दिया। यह सफलता व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक प्रयासों की कहानी है।

वर्तमान स्थिति और चिंताएं

हालांकि, बीते समय में पार्टी के कुछ फैसले और नीतियां सवालों के घेरे में आई हैं। इनमें से कुछ फैसलों ने पार्टी के बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को कठिनाई और यातनाओं का सामना करने पर मजबूर किया। सवाल यह उठता है कि क्या पार्टी अपने पुराने साथियों और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चल रही है? वर्तमान में यह महसूस किया जा रहा है कि पुराने योगदानकर्ताओं को दरकिनार कर दिया जा रहा है। यह स्थिति न केवल उनके मनोबल को गिरा सकती है, बल्कि संगठन के भीतर एक असंतोष का माहौल भी पैदा कर सकती है। संगठन के पुराने स्तंभ, जिन्होंने इसे मजबूत बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उनकी अनदेखी पार्टी की मूल भावना को कमजोर कर सकती है।

संगठन को मजबूत करने का रास्ता🌻

यह समय है कि पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को साथ लेकर चले। उनके अनुभव और सुझाव संगठन की मजबूती के लिए अमूल्य हो सकते हैं।

1. संवाद को बढ़ावा देना: नेतृत्व को चाहिए कि वे अपने पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच एक संवाद स्थापित करें।

2. योगदान का सम्मान: हर सदस्य के योगदान को पहचानना और उसका सम्मान करना संगठन को और मजबूत करेगा।

3. पारदर्शी निर्णय: पार्टी के सभी निर्णयों को पारदर्शी और सहभागी बनाना, ताकि हर कार्यकर्ता को यह महसूस हो कि वह संगठन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

4. संतुलित नेतृत्व: पार्टी को चाहिए कि वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में पुराने और नए नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए।

एकता और सुधार का संदेश :- संगठन की सफलता उसके सदस्यों की एकता में निहित है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर कार्यकर्ता, चाहे वह कितना ही पुराना या नया हो, उसे यह महसूस हो कि वह संगठन का अभिन्न हिस्सा है। एक पारदर्शी और समावेशी दृष्टिकोण न केवल पार्टी को मजबूत बनाएगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि वह अपने मूल उद्देश्यों से न भटके।
निष्कर्ष :-👇
आम आदमी पार्टी को एक परिवार की तरह चलाने की आवश्यकता है, जहां हर सदस्य का योगदान मूल्यवान हो। पुरानी और नई पीढ़ी के अनुभव और ऊर्जा के संतुलन से संगठन न केवल अपने मूल सिद्धांतों को बनाए रख सकता है, बल्कि आने वाले समय में और भी ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। पार्टी की ताकत उसकी जड़ों में है, और यह जड़ें उन्हीं लोगों ने मजबूत की हैं, जो शुरुआत से संगठन के साथ खड़े रहे। ऐसे में उनके योगदान का सम्मान और उन्हें साथ लेकर चलना ही पार्टी के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।

✒️- दिलीप झा 🌻

Friday, 21 July 2023

अंधराज मे मणिपुर हिंसा और महिलाओं को निर्वस्त्र कर रेप पर टिप्पणी


मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र कर रेप की घटना क्यों हुई? भीड़ को कहाँ से ताक़त मिली?

पिछले 9 वर्षों में याद करिए कि क्या क्या हुआ है-:

1. कठुवा की बच्ची के रेप के आरोपियों को बचाने के लिए रैली निकाली गई.
2. बिलक़िस बानो गैंग रेप के अपराधियों को स्पेशल तरीक़े से छोड़ा गया.
3. उन्नाव रेप
4. हाथरस गैंगरेप
5. शोषण का वीडियो आने के बाद लड़की को फँसा कर जेल में डालना (यह केस तो याद होगा?)
6. इतनी ख्याति प्राप्त महिला पहलवानों के यौन शोषण का महीनों मज़ाक़ बनाया गया.
7. ट्विटर पर सालों से विपक्ष की महिलाओं, आवाज़ उठाने वाली महिला पत्रकारों, के साथ गाली गलौज और रेप की धमकी तो चल ही रही है.
8. गुरमेहर, रिया चक्रवर्ती से लेकर तमाम महिलाएँ भीड़ का शिकार बनीं.

इस अंधराज में इनको पता है कि भीड़ बनकर जघन्य अपराध भी करो तो ये लोग बचा लेंगे. जब चुनाव हो तो ज़रूर बचाएँगे. इसे हिंदू vs अन्य बना देंगे और फिर बचाएँगे.

रेपिस्ट भीड़ और उसे बचाने वाले लोग- इससे ज़्यादा भयावह क्या है? यह भीड़ एक दिन में तैयार नहीं होती. पूरा सिस्टम लगता है इसे तैयार करने के लिए.

Monday, 5 October 2020

योगीराज में उत्तर प्रदेश के थाने दलितों पर अत्याचार

 योगीराज में उत्तर प्रदेश के थाने दलितों पर अत्याचार के अड्डे बन गए हैं। दलितों को मारपीटा जा रहा है और हत्या की जा रही है। थाने में जब यह न्याय मांगने जाते हैं तो उन्हें गालियां देकर भगा दिया जाता है। 

सूबे की वर्तमान हालात देखकर ‘अंग्रेजी शासन’ की यादें ताजा हो रही हैं। दलितों पर अत्याचार हो रहा है। आवाज उठाने पर मारा जाता है केस और पुलिस की धमकिया दी जाती हैं । 

आप निचे दियें गये ट्विटर स्क्र्रीनशॉट से समझ सकते हैं  मानसिकता है इनकी। 👇


आखिर ये कौन सी विचारधारा है जो जनता को गुलाम समझती हैं?


मैं Cmyogiadityanath Fan Club  और योगी जी  से कहना चाहता हूं कि आप कितनी भी बर्बरता कर लें लेकिन अब हम चुप नहीं बैठेंगे।


और देश और राज्य में अत्याचार के खिलाफ इसी तरीके से आम भाषा में अपनी आवाज उठाते रहेंगे

 जय हिंद जय भारत

ABP News ABP Live Aakarshan Uppal Halla Bol Tufail Aap

👇धमकिया आप भी पढ़े

बलात्कार-मुक्त समाज हम बना तो सकते हैं, लेकिन उसकी शुरुआत कैसे और कहां से हो?

 उत्तर प्रदेश के हाथरस में सामूहिक बलात्कार की जघन्य वारदात पर व्यापक आक्रोश के बीच इन घटनाओं के वर्णन का उद्देश्य सिनेमा रूपी माध्यम को या समाज के किसी खास वर्ग को कोसना या उसका नकारात्मक चित्रण करना नहीं है. क्योंकि आज हम उस दौर से बहुत आगे बढ़ चुके हैं. इंटरनेट क्रांति और स्मार्टफोन की सर्वसुलभता ने पोर्न या वीभत्स यौन-चित्रण को सबके पास आसानी से पहुंचा दिया है. कल तक इसका उपभोक्ता केवल समाज का उच्च मध्य-वर्ग या मध्य-वर्ग ही हो सकता था, लेकिन आज यह समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ हो चुका है. सबके हाथ में है और लगभग फ्री है. कीवर्ड लिखने तक की जरूरत नहीं, आप मुंह से बोलकर गूगल को आदेश दे सकते हैं. इसलिए इस परिघटना पर विचार करना किसी खास वर्ग या क्षेत्र के लोगों के बजाय हम सबकी आदिम प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास है. तकनीकें और माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन हमारी प्रवृत्तियां कायम रहती हैं या स्वयं को नए माध्यमों के अनुरूप ढाल लेती हैं.

साल 1989-90 की बात होगी. उत्तर भारत के किसी कस्बाई सिनेमाघर में कोई फिल्म दिखाई जा रही थी. पर्दे पर जैसे ही शक्ति कपूर रूपी खलनायक चरित्र ने अनीता राज रूपी चरित्र का बलात्कार करना शुरू किया, तो हॉल में सीटियां बजनी शुरू हो गईं. तभी अचानक बिजली चली गई. अब जब तक जेनरेटर चलाया जाता और पर्दे पर फिर से रोशनी आती तब तक दर्शकों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया. और जब बिजली आई तो कहा गया कि उस सीन को दोबारा चलाया जाए.

बड़ी संख्या में उस दौर के पुरुष दर्शक बलात्कार के दृश्य बहुत पसंद करते थे. हाट-बाज़ार में यहां-वहां लगे पोस्टरों के कोनों में जान-बूझकर ऐसे दृश्य अवश्य लगाए जाते थे, जिससे लोगों को यह पता चल सके कि इस फिल्म में बलात्कार का दृश्य भी है. सिनेमाघर के ठीक बाहर के पान की दुकानों पर ये शिकायत आम रहती थी कि बलात्कार का सीन तो दिखाया गया, लेकिन कपड़े ठीक से नहीं फाड़े, कुछ ठीक से नहीं दिखाया, उतना ‘मज़ा’ नहीं आया. हालांकि सिनेमाघर में मौजूद कुछ ऐसे दर्शक भी अवश्य होते थे, जिनकी सहानुभूति पीड़िता के चरित्र से रहती थी. यह कहना मुश्किल है कि उस दौर के फिल्मकारों ने लोगों की  मानसिकता को अच्छी तरह समझकर इस ट्रेंड को भुनाना शुरू किया था, या कि फिल्मकारों द्वारा इस रूप में परोसे गए दृश्यों की वजह से लोगों की रुचि और मानसिकता इस प्रकार की बन गई थी.

इससे मिलती-जुलती एक घटना कुछ समय पहले देखने में आई. बिहार में एक रात्रिकालीन बस (जिन्हें आमतौर पर ‘वीडियो कोच’ कहा जाता है) में सफर करते हुए कंडक्टर ने एक ऐसी फिल्म चलाई जिसमें फिल्म का प्रौढ़ खलनायक बार-बार अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग स्कूली बच्चियों का अपहरण और बलात्कार करता था. स्कूल यूनिफॉर्म में ही बलात्कार के दृश्यों को लंबा और वीभत्स रूप में दिखाया जा रहा था. इन पंक्तियों के लेखक ने कंडक्टर को बुलाकर कहा कि भाई, ये सब क्या चला रहे हो. इस बस में महिलाएं और बच्चे भी सफर कर रहे हैं, कम से कम उनका तो लिहाज करो. कंडक्टर अनसुना करते हुए आगे बढ़ गया. दोबारा ऊंची आवाज में कहा गया तो कंडक्टर भी भड़क गया. दाढ़ी और वेश-भूषा देखकर कहने लगा, बाबाजी ये आपके काम की चीज नहीं है, आप तो आंख बंद करके सो जाइये. लंबी बस में सबसे पिछली सीट पर बैठे लोग उस फिल्म का भरपूर आनंद लेना चाहते थे और बार-बार कंडक्टर से कह रहे थे कि वॉल्यूम बढ़ाओ. लेकिन इसके बाद चार-पांच अन्य मुसाफिरों ने भी जब उस फिल्म के दिखाने पर आपत्ति जताई और बात ड्राइवर तक जा पहुंची, तो आखिरकार फिल्म को बदल दिया गया और थोड़ी देर बाद उस वीडियो को ही पूरी तरह बंद कर दिया गया.

नब्बे के दशक के आखिर तक मध्य प्रदेश के एक छोटे जिले में इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि एक-दो ऐसे विशेष सिनेमाघर होते थे, जिनकी ख्याति ही ऐसी फिल्मों की होती थी जिनमें बलात्कार इत्यादि के कई दृश्य फिल्माए गए होते थे. प्रचलित शब्दावली में जिन्हें ‘बी ग्रेड’ या ‘सी ग्रेड’ कहा जाता था, ऐसी फिल्में ही उनमें दिखाई जाती थीं. नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के एक जिले के किसी ब्लॉक में हाल तक ऐसा एक विशेष सिनेमाघर देखने को मिला. यह बात वहां शो के इंतजार में खड़े दर्शकों से पूछने पर पता चली. ज्यादातर दर्शक नवयुवक और यहां तक कि किशोर उम्र के ही थे. घोषित रूप से मॉर्निंग शो में चलने वाली एडल्ट फिल्मों के अशोभनीय और वीभत्स पोस्टर दिल्ली के कनॉट प्लेस से लेकर पटना जैसी राजधानियों के लगभग हर सार्वजनिक स्थल परसटे हुए हम सबने देखे ही होंगे। 


Tuesday, 22 September 2020

बिहार मे किसान बिल के खिलाफ सड़क पर उतरे आप कार्यकर्ता

 पटना: भारी विरोध के बावजूद असंवैधानिक तरीके से संसद में पारित हुए किसान विरोधी अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार को चौतरफा घेरने के लिए सड़क पर संघर्ष किया। किसान बिल के विरोध में आप सांसद संजय सिंह राज्य सभा परिसर में ही चादर और तकिया लेकर धरने पर बैठे। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने बिहार सचिव श्रीवत्स पुरषोत्तम के नेतृत्व में राजधानी पटना में इनकम टैक्स गोलम्बर पर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।

भाजपा सरकार के किसान विरोधी बिल पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आम आदमी पार्टी बिहार के प्रदेश प्रवक्ता बबलू कुमार प्रकाश ने इसे काला कानून बताया और कहा कि किसानों की फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने, किसानों की आय दोगुनी करने के वादे को पूरा करने में नाकाम मोदी सरकार किसानों को पूँजीपतियों का गुलाम बनाना चाहती है। उन्होंने कहा, “आए दिन आत्महत्या कर रहे किसानों का दुख दर्द सुनने के बजाए, पूरे कृषि क्षेत्र को पूजीपतियों के हवाले करने की साजिश है यह किसान विरोधी बिल।

उन्होंने कहा देश में किसानों की हालत पहले से ही बदतर है। प्रदेश की सरकार किसानों को खाद बीज बिजली पानी उपलब्ध करवाने में असमर्थ है न ही गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान हो रहा है। प्रदेश का किसान आत्महत्या को मजबूर है।ऐसे समय भी मोदी सरकार पूंजीपतियों के साथ खड़ी है। बबलू ने कहा आम आदमी पार्टी हमेशा किसानों के हक में खड़ी है और उनके साथ अन्याय नहीं होने देगी।

प्रदेश सचिव श्रीवत्स पुरुषोत्तम ने किसान बिल पर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि मोदी  सरकार किसानों की आवाज को दबाना चाहती है। हम इसके खिलाफ मजबूती से लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र में बैठी भारतीय जनता पार्टी की सरकार को उन 80 प्रतिशत लोगों की कोई चिंता नहीं है। जो गाँव में रहते हैं और कृषि पर निर्भर हैं। एमएसपी ऑर्डिनेंस बिल इस बात का जीता जागता प्रमाण है।

पार्टी नेता राजेश सिन्हा ने कहा कि कृषि को प्राइवेट हाथों में देने के लिए यह बिल लाया गया है। इस बिल के कारण धान और गेहूं की एमएसपी खत्म हो जाएगी।बिल के माध्यम से सरकार ने प्राइवेट कंपनियों को कृषि सेक्टर को हड़पने की खुली छूट दे दी है। केंद्र सरकार द्वारा एयरपोर्ट, एलआईसी, बैंक, एयर इंडिया बेचने के अलावा रेलवे का निजीकरण करने पर नाराजगी जताते हुए आम आदमी पार्टी ने कहा कि अब प्रधानमंत्री मोदी इस किसान अध्यादेश के माध्यम से किसानों की खेती को भी छिनना चाहते हैं।

‘आप’ चिकित्सा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. पंकज गुप्ता ने कहा कि इस बिल के पास होने से बड़े-बड़े पूंजिपतियों को कृषि क्षेत्र में आने का मौका मिलेगा। 10-20 एकड़ जमीन के क्लस्टर बनेंगे और पूंजीपति कहीं से भी फसल खरीद कर, देश में कहीं भी उसका भंडारण कर सकेंगे। आपको बता दें कि इस अध्यादेश के पारित होने के बाद किसी भी जरूरी वस्तु को कहीं भी इकट्ठा करने, जरूरी वस्तुओं का जितना चाहे उतना भंडारण करने और जब मन चाहे उसे बेचने की स्वीकृति मिल गई है। रविवार को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के उपज, व्यापार और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से संबंधित दो विधेयक पेश किए थे, जिसका विरोध करते हुए आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इसे भारतीय जनतंत्र के लिए काला कानून कहा था। साथ ही “सड़क से लेकर संसद तक” इस विधेयक के विरोध में प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। पूरे विपक्ष और सहयोगी अकाली दल के विरोध के बाद भी राज्यसभा से इस विधेयक को पास किए जाने के विरोध में सदन में जम कर हंगामा हुआ था। 

मौके पर पटना जिला अध्यक्ष चौधरी ब्रह्म प्रकाश यादव, अरुण रजक, राजेश सिन्हा, सुयश कुमार ज्योति, अर्जुन ठाकुर, उमा दफ़्तुआर, दिलीप झा, संजीव कुमार, अंजनी पोद्दार, शैल देवी, सन्नी कुमार, सतीश कुमार, अमित कुमार, रंजीत सिंह, रवि कुमार, कृष्ण मुरारी गुप्ता मौजूद थे।

 

Friday, 24 April 2020

ग्राम पंचायतें ग्रामीण प्रशासन का महत्वपूर्ण अंग है।

मित्रों 🙏 आज #National_Panchayati_Raj_Day हैं औऱ आज प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी निर्वाचित प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए, "महिला सरपंचों के पतियों" या "सरपंच पति" की प्रथा को समाप्त करने का आह्वान किया, ताकि वे सत्ता में चुने जाने वाले अपने काम के लिए अनुचित प्रभाव डाल सकें।

इस संदर्भ मे मैं अपना विचार जानता के समक्ष रखना चहता हूँ ताकी सरकार इन पहलूओ पर भी ध्यान केन्द्रित कर सकें .

॥ आवश्यकता, महत्व और समस्या व सुझाव ॥ 

प्राचीन काल से ही ग्राम पंचायतें ग्रामीण प्रशासन का महत्वपूर्ण अंग रही है। वस्तुतः पंचायतराज प्रणाली एक एैसी प्रणाली है। जिसमें हमें लोकतंत्र का सही ढांचा दिखाई देता है। मगर वर्तमान पंचायती संस्थाऐं इस मायने में कई महत्वपूर्ण अधिकार साधन और उत्तरदायित्व सौपे गये है। स्वाधीनता से पहले और उसके बाद भी इस बात के लिए आंदोलन होता रहा कि अगर हमें सच्चे अर्थों में अपने गांवों में स्वराज्य पहुंचाना है तो उसके लिए पंचायती राज की स्थापना करनी होगी इनका महत्व और उपयोगिता निम्नलिखित बातों से स्पश्ट हैंः-

पंचायती राज व्यवस्था एक एैसी व्यवस्था है, जो केन्द्रिय एवं राज्य सरकारो को स्थानीय समस्याओं के भार से हल्का करती है। उनके द्वारा ही शासकीय शक्तियों एवं कार्यो का विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है। प्राजातांत्रिक प्रणाली में कार्यांे का विकेन्द्रीकरण करने पर इस प्रक्रिया में  शासकीय सत्ता गिनी चुनी संख्याओं में न रखकर गांव की पंचायत के कार्यकताओं के हाथों में पहुंच जाती है जिससे कि इनके अधिकार और कार्य क्षेत्र बढ़ जाते हैं। स्थानीय व्यक्ति स्थानीय समस्याओं को अच्छे ढंग से सुलझा सकते हैं। क्योकि वे लोग वहां की समस्या एवं परिस्थितियों को अधिक अच्छे से जानते है। इन स्थानीय पदाधिकारियों के बिना ऊपर से प्रारंभ किये हुए राश्ट्र निर्माण के क्रियाकलापों का सुचारूपूर्ण ढंग से चलना भी मुश्किल हो जाता है। इस प्रकार ग्राम पंचायत स्वस्थ प्रजातांत्रिक परम्पराओं को स्थापित करने के लिए ठोस आधार प्रदान करती है, शासन सत्ता ग्रामवासियों के हाथ में चली जाने से प्रजातांत्रिक संगठनों के प्रति उनकी रूचि जागृत होती है। पंचायती राज व्यवस्था के स्थापित होने से यह संख्या ग्राम व देश के लिए भावी नेतृत्व तैयार करती है। विधायकों तथा मंत्रियों को प्राथमिक अनुभव एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है। जिससे वे ग्रामीण भारत की समस्या से अवगत हो। इस प्रकार गांवों में उचित नेतृत्व का निर्माण करने एक विकास कार्यो में जनता की रूचि बढ़ाने में पंचायतों का प्रभावी योगदान रहता है

पंचायतें प्रजातंत्र का प्रयोगशाला है। यह नागरिको को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा देती है। साथ ही उनमें नागरिक गुणों का विकास करने में मदद करती है। पं. नेहरू ने स्वंय कहा था कि “मैं पंचायती राज के प्रति पूर्णतः आशान्वित हूॅं मैं महसूस करता हूॅ कि भारत के संदर्भ में यह बहुत कुछ भौतिक एवं क्रांतिकारी है।“ औऱ वर्तमान मे  “इन संस्थाओ ने नये स्थानीय नेताओं को जन्म दिया है जो आगे चलकर राज्य और केन्द्रीय समाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियो से अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं। इस प्रकार इन संस्थाओं ने देश के राजनीतिक आधुनिकीकरण और सामाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्माण किया है तथा हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जन हिस्सेदारी में कृशि करके गांवों में जागरूकता उत्पन्न कर दी है।

॥ समस्या ॥ 

यद्यपि पंचायती राज व्यवस्था विभिन्न कारणों से ग्रामीण जनता मे नई आशा और विश्वास पैदा करने में असफल रही है तथापि कुछ मायनों में यह संस्था अवश्य सफल रही है। वस्तुतः जब तक ग्रामीणों मे चेतना नहीं आती तब तक ये संस्थाएंये सफल नहीं हो सकती। इसके समक्ष कुछ नई समस्याएॅं उत्पन्न हो गई हैं। जिसका निराकरण करना आवश्यक हैः-

1.अशिक्षा और और ग्रामीणों की निर्धनता की विकट समस्या विकराल रूप  धारण कर चूकि है। ऐसी स्थिति मंे ग्रामीण समुदाय व नेतृत्व अपने संकीर्ण स्तरों से उपर उठ नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण व्यक्ति पंचायती राज की आवश्यक्ता और महत्व के बारे मंे अज्ञानतावश और अपनी निर्धनता के कारण कुछ भी नहीं कर पाते ।

2. पंचायती राज की सफलता मंे दलगत राजनीति भी विशेश रूकावट रही है। पंचायतंे स्थानीय राजनीति का अखाड़ा बनती जा रही हैं। यदी हमारे राजनीतिक दल  पंचायतों के चुनावो में हस्तक्षेप करना बंद कर दे तो पंचायतों को दूशित राजनीति से बचाया जा सकता है। लोकतंत्र की सफलता की पहली शर्त सत्ता का स्थानीय संस्थाओं को हस्तांतरण करना है। यह तभी संभव है जब राजनीतिक प्रेरणा नीचे के स्तरों से शुरू हो और उच्च स्तर केवल मार्ग निर्देशन का कार्य करे। राज्य सरकारें इन संस्थाओं को अपने आदेशों का पालन करने वाला ऐजेन्ट मात्र न समझे। इसके लिए नौकरशाही की मनोवृत्ति में भी परिवर्तन की अवश्यक्ता है।

3. संस्थाओं में आर्थिक स्त्रोत की कमी इन्हें शासकीय अनुदान पर ही जीवित रहना पड़ता है। अतः पंचायती राज संस्थाओं के संचालन के लिए आय के पर्याप्त एवं स्वतंत्र स्त्रोत प्रदान किये जाने चाहिए ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुढृढ़ बन सके।

4. राजनीतिक जागरूकता की कमी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। जो पंचायती राज समस्याओं की सफलता मंे रूकावट बनते हैं।

5. स्थानीय निकायों पर स्थानीय, सांसदों, मंत्रियों और प्रभावशाली नेताओं के घरानों एवं रिश्तेदारों का कब्जा हो रहा है।

6. स्थानीय निकायों पर संगठित माफियो और अपराधियों का कब्जा हो रहा है।

7. महिला आरक्षण अर्थहीन हो गया है, क्योंकि सरपंच या प्रधान पति नामक एक नवीन प्रजाति का उदय हुआ है।

8. वैमनस्यता मंे वृद्धि हुई है।

9. स्थानीय निकायों के सदस्य स्वस्थ योजनाओं के बजाय अधिकतम निर्माण कार्यों में रूचि लेते हैं, पंचायतों के अधिकांश ठेकेदार स्वयं मुखिया, पार्शद या उनके रिश्तेदार होते हैं ।

10. भारत के अधिकांश पंचायत प्रतिनिधियों पर भ्रश्टाचार एवं गबन के मामले दर्ज हुए हैं।

इस प्रकार स्पश्ट है कि दूशित राजनीति संस्कृति के कारण पंचायती राज का क्रियान्वयन संतोशजनक नहीं है।

॥ सुझाव॥ 

लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था गांवों से लेकर संसद तक प्रत्येक स्तर पर जनता के प्रतिनिधियों की अधिकतम भागीदारी हो। भारत में गांव आर्थिक समृद्धि के प्रतिक हैं। अतः देश तभी समृद्ध हो सकता है जबकि इसकी आत्मा के रूप मंे गांवों की प्रगति हो और गांवों का सर्वांगीण विकास पंचायतों की सफलता के द्वारा ही संभव है।

1.आज जरूरत इस बात की है कि योजनाओं के बेहतर समन्वय और क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाये। निगरानी तंत्र को मजबूत बनाया जाय और भ्रश्टाचार पर लगाम लगाने सख्त कार्यवाही की जाये। औऱ निगरानी मे गैर सरकारी  ग्रामसभा के लोगों कों सामिल किया जाये .

2. पूरा प्रशासनिक ढांचा निहित स्वार्थ के कब्जे में है।

3.आवश्यकता इस बात की है कि. ग्राम पंचायती व्यवस्था के नाम पर राजनीति के केन्द्र ना बन जाय यदि एैसा होता है तो पंचायतीराज व्यवस्था की जड.े हिल जायेगी और सच्चे लोकतंत्र की आधार शिला ढह जायेगी 

किसी भी देश , प्रदेश या गांव में पंचायती राज व्यवस्था तभी करगर हो सकती है जब उसके क्रियाकलापों को दलगत राजनीति से दूर रखा जाय यह भी सच है कि पंचायतीराज लोकतंत्र का यंत्र भी है। अतः पंचायतीराज संस्थाओं मूें व्याप्त गुटबन्दी को समाप्त करना भी इनके हित में ही होगा । 

पंचायतों के वित्तिय हालत में भी सुधार अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों को भी पंचायतों के मित्र,सहयोगी और पथ प्रदर्शक के रुप में कार्य करना चाहिये। पंचायतीराज व्यवस्था को आम जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करना चाहिए। आम जनता की भावना की अवज्ञा करके कोई भी देश लोकतंत्र की सफलता का दावा नहीं कर सकता।

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धणेवाद .🙏 🙏